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प्राचीन ग्रंथों में वज्ञान एवं प्रौद्यो गकी भारत में प्राचीन काल से ही वज्ञान एवं प्रौद्यो गकी अध्ययन अध्यापन का एक प्रमख ु वषय रहा है । चाहे खगोल वज्ञान हो या ज्यो तष शास्त्र; ग णत हो या च कत्सा वज्ञान, प्राचीन भारतीय सा हत्य में वज्ञान की प्रत्येक शाखा से संबं धत ग्रंथों का वपल ु और व वधता संपन्न भंडार है । भारत में आ दकाल से ज्ञान तथा शक्षा का मख् ु य स्रोत वेदों को माना गया है । वै दक सा हत्य का ही एक अंग ‘ज्यो तष’ है जो क ज्यो तष वज्ञान का मल ू ग्रंथ माना जाता है । इस पस् ु तक में सय ू , पथ् ृ वी, नक्षत्र तथा ऋतु आ द के बारे में चचा की गई है । आगे चलकर ‘वराह म हर’ ने ‘पंच सद्धािन्तका’ तथा ‘वह ृ ज्जातक’ में , तो वहीं आयभट्ट ने अपनी पस् ु तक ‘आयभट् टयम’ में ज्यो तष पर वस्तत ृ चचा की । वै दक ग्रंथों में पंच महाभत ू तत्वों के माध्यम से मानव शरीर के नमाण की बात की गई । इसी दशा में शोध करते हुए भौ तकशास्त्री ‘कणाद’ एवं ‘पकुध कात्यायन’ ने 'परमाण'ु एवं इसके नमाण से संबं धत सद्धांत दए । उन्होंने यह सा बत कया क भौ तक संसार इन्हीं परमाणओ ु ं से मलकर बना है । उन्होंने परमाणओ ु ं को अ वनाशी माना । ये सद्धांत आज भी परमाणु वज्ञान के क्षेत्र में महत्वपण ू हैं। वहीं प्रख्यात रसायन वद ‘नागाजन’ ु ने अपनी पस् ु तक ‘रसरत्नाकर’ में धातओ ु ं के शोधन, शद् ु ध पारद प्राि त तथा भस्म बनाने की व धयों का उल्लेख कर रसायनशास्त्र में अपना योगदान दया । इस वषय में एक प्र सद्ध पस् ु तक ‘गो वंद भगवतपाद’ की ‘रसहृदयतन्त्र’ भी है । च कत्सा शास्त्र की बात करें तो चरक, सश्र ु त ु , वागभट्ट तथा धनवंत र जैसे महान च कत्सकों की रचनाएं उल्लेखनीय हैं। जहां ‘सश्र ु त ु सं हता’ में शल्य च कत्सा तथा नेत्र वज्ञान की जानकारी मलती है तो वहीं ‘चरकसं हता’ में औष धयों एवं जड़ीबू टयों के बारे में वस्तत ु हॺद ृ वणन मलता है । ‘वागभट्ट’ की 'अष्टांग हृदय' आयव का एक प्रमख ु ग्रंथ है । ग णत वषय के उद्भव एवं वकास का भारत एक प्रमख ु केंद्र रहा है । ‘यजव ु हॺद’ में एक से लेकर 10 खरब तक की संख्याओं का उल्लेख मलता है । ग णतशास्त्र की प्रारं भक पस् ु तक 'शल् ु वसत्र ू ' बौधायन ने लखी िजसमें उन्होंने 'पाई' तथा 'पाइथागोरस प्रमेय' के समान कुछ अवधारणाओं का उल्लेख कया। 'अपस्तंब' ने दस ू री शताब्दी ई.प.ू में रे खा ग णत की अवधारणाओं यथा न्यन ू कोण, अ धककोण आ द का वणन कया। 'आयभट्ट' ने 'शन् ू य' तथा दशमलव पर व्यापक शोध कया। तो वहीं बीजग णत के वकास का श्रेय भी आयभट्ट को ही दया जाता है । आगे चलकर इस क्षेत्र में 'महावीराचाय' ने 'ग णत सारसंग्रह' तथा 'भास्कराचाय' ने ' सद्धांत शरोम ण' की रचना की जो आज भी ग णत के प्रमख ु ग्रंथों में शम ु ार है । खगोल वज्ञान भी भारतीय सा हत्य का एक पसंदीदा वषय रहा है । आयभट्ट ने अपनी पस् ु तक में प्रथम बार यह बताया क पथ् ृ वी गोल है तथा अपने अक्ष पर घण ू न करती है । तो दस ू री ओर वराह म हर की पस् ु तक 'वह ू रूप से खगोल वज्ञान को सम पत है । ृ द सं हता' पण प्रौद्यो गकी को सम पत भी कईं ग्रंथ भारतीय सा हत्य में मलते हैं जैसे - नारद शल्पशास्त्रम, शल्पदीपक, अपरािजतपच् ृ छा, समरांगणसत्र ू धार, यिु तकल्पतरु आ द। इन ग्रंथों में वास्तश ु ास्त्र, राजभवन नमाण, जहाज नमाण आ द वषयों की वस्तत ृ जानकारी मलती है । इस प्रकार यह कहा जा सकता है क शरु ु आत से ही भारतीय सा हत्य में वज्ञान एवं प्रौद्यो गकी को एक अलग वषय के रूप महत्व दया जाता रहा है । साथ ही इन व भन्न प्राचीन वैज्ञा नक ग्रंथों ने भी भारतीय ज्ञान परं परा में अनठ ू ा योगदान दया है । साथ ही इन्होंने आधु नक वैज्ञा नक उपलिब्धयों रूपी ढांचे के लए एक नींव का काय कया है ।
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